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चिकनगुनिया वायरस के विरुद्ध आयुर्वेदिक गौमूत्र अर्क में एंटीवायरल यौगिकों की पहचान की  प्राचीन आयुर्वेदिक उपचार और आधुनिक वायरोलॉजी का संगम अध्ययन में नवीन प्राकृतिक यौगिक-आधारित फॉर्मुलेशन के माध्यम से वायरल लोड में उल्लेखनीय कमी का खुलासा

 रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के शोधकर्ताओं ने चिकनगुनिया के विरुद्ध लड़ाई में महत्वपूर्ण और आशाजनक परिणामों की रिपोर्ट दी है। चिकनगुनिया एक मच्छर जनित वायरल रोग है, जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस अध्ययन में गौमूत्र अर्क में उपस्थित प्रमुख जैव-सक्रिय यौगिकों की पहचान की गई है, जो चिकनगुनिया वायरस के विरुद्ध उल्लेखनीय एंटीवायरल गतिविधि प्रदर्शित करते हैं। यह खोज आयुर्वेद-प्रेरित तथा किफायती एंटीवायरल उपचारों के विकास के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत करती है।

यह शोध हाल ही में प्रतिष्ठित जर्नल एसीएस एग्रीकल्चरल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन का नेतृत्व आईआईटी रुड़की के जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग की प्रो. शैल्ली तोमर और उनकी टीम ने किया। यह शोध भारत के प्रमुख आयुर्वेदिक एवं जैव-चिकित्सीय संस्थानों के शोधकर्ताओं के सहयोग से सम्पन्न हुआ।

अध्ययन में उन्नत वायरोलॉजी, मेटाबोलोमिक्स, मॉलिक्यूलर डॉकिंग और जैव-रासायनिक विश्लेषणों का उपयोग कर एंटीवायरल गतिविधि के लिए उत्तरदायी यौगिकों की पहचान की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि गौमूत्र अर्क से उपचार करने पर सुरक्षित सांद्रता स्तरों पर चिकनगुनिया वायरस की मात्रा में 90 प्रतिशत से अधिक कमी आई। वहीं गौमूत्र अर्क, थाइमोक्विनोन तथा पाइपरीन (काली मिर्च से प्राप्त) के एक अनुकूलित संयोजन ने प्रयोगशाला परिस्थितियों में वायरल लोड में 99.85 प्रतिशत तक की प्रभावशाली कमी प्रदर्शित की।

आगे की जांच में बेंजोइक एसिड, हिप्यूरिक एसिड और ओलिक एसिड को ऐसे प्रमुख घटकों के रूप में पहचाना गया जो एंटीवायरल गतिविधि में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन यौगिकों को वायरस की प्रतिकृति में शामिल महत्वपूर्ण वायरल प्रोटीनों के कार्य में हस्तक्षेप करते हुए पाया गया, जो भविष्य में एंटीवायरल औषधियों के विकास के लिए इनके संभावित उपयोग को रेखांकित करता है।

शोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, प्रो. कमल किशोर पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की, ने कहा, “उभरते और पुनः उभरते वायरल रोगों से निपटने के लिए नवोन्मेषी, किफायती और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित समाधानों की आवश्यकता है। यह शोध आईआईटी रुड़की की उस प्रतिबद्धता का उदाहरण है, जिसके अंतर्गत पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के बीच सेतु स्थापित कर वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान खोजा जा रहा है।”

शोध निष्कर्षों के वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित करते हुए, प्रो. शैल्ली तोमर, जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग, आईआईटी रुड़की तथा अध्ययन की समन्वयक लेखिका ने कहा, “हमारा शोध न केवल आयुर्वेदिक गौमूत्र अर्क में उपस्थित एंटीवायरल गतिविधि वाले विशिष्ट जैव-सक्रिय अणुओं की पहचान करता है, बल्कि प्राकृतिक यौगिकों के समन्वित फॉर्मुलेशन की शक्ति को भी प्रदर्शित करता है। ये निष्कर्ष चिकनगुनिया तथा संभावित रूप से अन्य संबंधित वायरल संक्रमणों के विरुद्ध अगली पीढ़ी की एंटीवायरल रणनीतियों के विकास के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। हालांकि, इनके चिकित्सीय उपयोग की संभावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए आगे प्री-क्लिनिकल तथा ट्रांसलेशनल अध्ययन आवश्यक होंगे।”

चिकनगुनिया वायरस मुख्य रूप से एडीज मच्छरों के माध्यम से फैलता है और इससे तेज बुखार, गंभीर जोड़ों का दर्द तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके बढ़ते वैश्विक प्रभाव के बावजूद वर्तमान में इसके लिए प्रभावी एंटीवायरल उपचार विकल्प सीमित हैं। आईआईटी रुड़की के इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष इस महत्वपूर्ण चिकित्सीय आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में मूल्यवान वैज्ञानिक जानकारी प्रदान करते हैं।

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