
हरिद्वार। भूमानिकेतन आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद तीर्थ महाराज ने कांवड़ यात्रियों से भावपूर्ण अपील करते हुए कहा कि कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, सेवा, संयम और समर्पण का पवित्र पर्व है। इसे दिखावे, प्रतिस्पर्धा और अहंकार का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में कांवड़ यात्रा का मूल उद्देश्य शिवभक्ति है, न कि शक्ति प्रदर्शन। आजकल अत्यधिक भारी कांवड़, तेज ध्वनि वाले साउंड सिस्टम और दिखावे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, जिससे यात्रा का आध्यात्मिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है।स्वामी अच्युतानंद तीर्थ महाराज ने कहा कि कई युवा 50 से 100 किलोग्राम तक भार उठाकर अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। चिकित्सकों की जानकारी का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि अत्यधिक वजन उठाने से कंधों, रीढ़, नसों और जोड़ों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। विशेष रूप से किशोरों और युवाओं के लिए यह भविष्य में स्थायी शारीरिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि “भगवान शिव भाव के भूखे हैं, भार के नहीं।” यदि कोई श्रद्धालु एक-दो किलोग्राम गंगाजल भी सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ अर्पित करता है, तो वही सर्वोत्तम पूजा है।
स्वामी अच्युतानंद तीर्थ ने यह भी कहा कि कांवड़ यात्रा में नशा, अशोभनीय संगीत, तेज ध्वनि और हुड़दंग का कोई स्थान नहीं है। उनके अनुसार कांवड़ यात्रा मूलतः सतोगुण की साधना है, लेकिन जब इसमें अहंकार, प्रदर्शन, शोर-शराबा और अनुशासनहीनता शामिल हो जाती है, तो यह रजोगुण और तमोगुण की ओर बढ़ने लगती है।
उन्होंने सभी कांवड़ यात्रियों से मर्यादा, अनुशासन और सच्ची शिवभक्ति के साथ यात्रा संपन्न करने का आह्वान किया, ताकि इस पावन परंपरा की गरिमा और आध्यात्मिक स्वरूप बना रहे।





