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हरेला सुख – शान्ति और समृद्धि सहित अच्छी फसल का सूचक: डॉ० (प्रो०) डी० सी० पसबोला* *हरेला पर्व के अवसर पर बांज, देवदार सहित अन्य औषधीय पौधों का वृक्षारोपण किया गया।*

देहरादून/चकराता: दिनांक 16 जुलाई 2026, गुरुवार। हरेला पर्व के अवसर पर राज० प्राथमिक विद्यालय, चकराता ब्लाक, देहरादून में वृहद व‌क्षारोपण अभियान चलाया गया। जिसमें आयुष विभाग की ओर से डॉ० (प्रो०) डी० सी० पसबोला द्वारा बांज, देवदार, स्टीविया, इन्युलिन, अश्वगंधा, शतावरी, ब्राह्मी, पुदीना, तुलसी, सदाबहार, पत्थरचट्टा, चांदनी, रजनीगंधा, सर्पगंधा, अकरकरा, वच, गिलोय, एलोवैरा, धनिया, पिप्पली, अजवाइन, भृंगराज, नागरमोथा, इलायची (छोटी एवं बड़ी), पुनर्नवा आदि इत्यादि औषधीय पौधों एवं आंवला, नींबू आदि इत्यादि फलदार पौधों का वृक्षारोपण किया गया।

डॉ० (प्रो०) पसबोला द्वारा जानकारी देते हुए बताया गया कि देवभूमि उत्तराखंड में सावन का आरंभ ‘हरेला पर्व’ के साथ होता है जो कि इस बार 16 जुलाई को मनाया जा रहा है । यह पर्व विशेषत: कुमाऊं क्षेत्र में मनाया जाता है। हरेला पर्व प्रकृति के निकट जाने और उसके प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है। इस दिन कुमाऊं क्षेत्र में गाजे-बाजे के साथ नए पौधे लगाये जाते हैं और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प भी लिया जाता है। वैसे, इस त्योहार को कांगड़ा, शिमला और सिरमौर क्षेत्रों में हरियाली या रिहयाली, हिमाचल प्रदेश के जुब्बल और किन्नौर क्षेत्रों में दखरैन के नाम से भी जाना जाता है । पर्व के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि अगर परिवार का कोई सदस्य त्योहार के दिन घर में मौजूद न हो तो उसकी तरफ से बाकायदा हरेला रखा जाता है और जब भी वह घर पहुंचता है तो बड़े-बजुर्ग उसे हरेला से पूजते हैं। कई परिवार इसे अपने परिवार के दूरदराज के सदस्यों को डाक द्वारा भी पहुंचाते हैं। देश-विदेश में बसे लोग चिट्ठियों के लिए जरिए हरेला के तिनकों को आशीष के तौर पर भेजते हैं। जीते रहो, सजग रहो। तुम्हारी लंबी उम्र हो। इस शुभ दिन पर हर वर्ष भेंट करते रहना। जैसी दूर्वा अपनी मजबूत पकड़ के साथ धरती में फैलती जाती है, वैसे आप भी समृद्ध होना। बेरी के पौधों की तरह आप भी विपरीत परिस्थितियों में फलित और प्रफुल्लित रहना। जब तक हिमालय में बर्फ रहेगी, जब तक गंगा जी मे पानी रहेगा अर्थात अनंत वर्षो तक तुमसे भेंट होती रहे ,ऐसी कामना है।

हरेला अच्छी फसल का सूचक होता है । हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल फसलों को किसी दैवीय आपदा से नुकसान न हो । यह भी मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे खेती-बाड़ी में उतना ही फायदा होगा । वैसे तो हरेला हर घर में बोया जाता है लेकिन किसी-किसी गांव में हरेला पर्व को सामूहिक रूप से स्थानीय ग्राम देवता के मंदिर में भी मनाया जाता है। गांव के लोगों द्वारा मिलकर मन्दिर में हरेला बोया जाता है, उसकी देखभाल की जाती है और सभी लोगों द्वारा इस पर्व को हर्षोल्लास से मनाया जाता है । हरेला लगाने का तरीका यह है कि सबसे पहले पैरों , फिर घुटनों , फिर कन्धे और अन्त में सिर पर रखा जाता है और लम्बी उम्र की कामना की जाती है। इस प्रकार हरेला घर में सुख-शांति व समृद्धि का भी प्रतीक है ।

वृक्षारोपण कार्यक्रम में प्रधानाचार्य भगत सिंह सहित समस्त स्टाफ का अमूल्य योगदान रहा।

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