
रुड़की।क्रांतिकारी शालू सैनी के मन की पीड़ा आखिर सोनू कश्यप की हत्या हो या किसी दलित मां की चीख या फिर न्याय के लिए सड़कों पर उतरे सैकड़ों पीड़ित परिवार।इंसाफ के लिए सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता है,आखिर जिम्मेदार कौन है?यह सवाल आज सिर्फ मेरा नहीं,बल्कि उस हर आम नागरिक का है,जिसकी आंखों के सामने न्याय धीरे-धीरे दम तोड़ता दिखाई दे रहा है।सोनू कश्यप की निर्मम हत्या हो या किसी दलित मां के बेटे को बेरहमी से छीन लेने की कहानी,तस्वीर बदलती है,दर्द नहीं।हर बार एक ही दृश्य दोहराया जाता है।शव,आक्रोश,सड़कें, नारे,पुलिस, आश्वासन और फिर…सन्नाटा।क्या इंसाफ अब केवल सड़क पर ही मिलता है?संविधान हमें समानता,सुरक्षा और न्याय का अधिकार नहीं देता है।फिर सवाल उठता है कि जब किसी गरीब,दलित या कमजोर वर्ग के व्यक्ति के साथ अन्याय होता है,तो उसे थाने से लेकर कोर्ट तक भटकना क्यों पड़ता है?क्यों उसकी सुनवाई तब होती है,जब वह सड़क पर उतर आता है,जब शहर जाम होता है,जब मीडिया कैमरे चमकते हैं?सोनू कश्यप की हत्या सिर्फ एक हत्या नहीं थी,वह उस व्यवस्था पर करारा तमाचा थी,जो दावा तो कानून-व्यवस्था का करती है,लेकिन जमीनी सच्चाई में अक्सर कमजोर के आगे बेबस दिखती है।क्या सोनू को न्याय के लिए जिंदा रहते संघर्ष करना चाहिए था?या उसकी मौत के बाद ही सिस्टम जागना जरूरी था।दलित मां की पीड़ा कौन समझे?जिस मां ने अपने बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा किया,आज वही मां इंसाफ के लिए दर-दर भटकती है।उसकी आंखों के आंसू,उसकी टूटी आवाज किसी फाइल का हिस्सा बनकर रह जाती है।सवाल यह नहीं कि वह रो क्यों रही है,सवाल यह है कि उसे रोने पर मजबूर किसने किया?जिम्मेदार कौन है?क्या वह प्रशासन,जो समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं करता?क्या वह पुलिस व्यवस्था,जो दबाव में आकर या लापरवाही से केस को हल्का कर देती है,क्या वह समाज,जो जाति देखकर पीड़ित और आरोपी तय कर लेता है?या हम सब,जो दो दिन गुस्सा होकर फिर चुप हो जाते हैं?सच तो यह है कि जिम्मेदारी बंटी हुई नहीं,सामूहिक है।जब तक अपराध जाति,रसूख और पैसे के तराजू पर तौले जाते रहेंगे,तब तक इंसाफ अंधा नहीं,मजबूर रहेगा।

सड़कों पर उतरना मजबूरी है,शौक नहीं।कोई भी मां,कोई भी परिवार यूं ही आंदोलन नहीं करता।यह सिस्टम की विफलता है कि न्याय की गुहार लगाने के लिए सड़क ही आखिरी विकल्प बन जाती है।अगर थाने में समय पर रिपोर्ट दर्ज हो जाए,अगर निष्पक्ष जांच हो,अगर दोषियों पर बिना दबाव कार्रवाई हो,तो शायद नारे न लगते,चक्का जाम न होते और लाशों पर राजनीति न होती।अब सवाल यह नहीं कि अगला कौन होगा?सवाल यह है कि क्या हम अगली घटना का इंतज़ार करेंगे? या आज ही यह तय करेंगे कि इंसाफ सड़क पर नहीं,सिस्टम के भीतर से मिलेगा?सोनू कश्यप की हत्या और दलित मां की पीड़ा हमें आईना दिखाती है।यह आईना तोड़ना नहीं,इसमें खुद को देखना जरूरी है,क्योंकि जब तक हर पीड़ित को बिना प्रदर्शन के न्याय नहीं मिलेगा,तब तक यह चीखें यूं ही गूंजती रहेंगी।”इंसाफ चाहिए…इंसाफ चाहिए!”




























