
रुड़की/नई दिल्ली।हज कमेटी आफ इंडिया एवं सेंट्रल वक्फ कौंसिल भारत सरकार के पूर्व सदस्य,वरिष्ठ समाजसेवी व मानवाधिकार कार्यकर्ता इरफान अहमद ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस्लाम के अनुयायी होने के नाते,बांग्लादेश में हाल ही में हुई भीड़ द्वारा की गई हत्या जैसी घटनाएँ हमें कठिन प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करती हैं,न कि दूसरों से,बल्कि स्वयं से।जब पैगंबर,कुरान या इस्लाम की रक्षा के नाम पर किसी इंसान की हत्या कर दी जाती है,तो कुछ बहुत गलत हो रहा है,जिस आस्था का उद्देश्य मानवीय गरिमा को बढ़ाना था,उसका उपयोग उसे नष्ट करने के लिए किया जा रहा है।यह केवल एक राजनीतिक या कानूनी संकट नहीं है।यह एक नैतिक और धार्मिक संकट है।एक मुस्लिम विद्वान का दृष्टिकोण एक सरल,लेकिन असहज सत्य से शुरू होता है।ईशनिंदा के आरोपों के जवाब में भीड़ द्वारा की गई हिंसा का इस्लाम में कोई औचित्य नहीं है।यह कुरआन,पैगम्बर के उदाहरण और इस्लामी कानून के उद्देश्यों के विपरीत है।क़ुरआन बार-बार मानव जीवन की पवित्रता की पुष्टि करता है।जो कोई निर्दोष आत्मा की हत्या करता है,वह ऐसा है मानो उसने पूरी मानवता की हत्या कर दी हो।क़ुरआन की आयत क्रोध,आहत भावनाओं या धार्मिक आक्रोश के लिए कोई अपवाद नहीं बनाती।मनुष्य का जीवन सांप्रदायिक स्वीकृति या जनभावना पर निर्भर नहीं है,फिर भी भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में,ईशनिंदा के आरोप सामूहिक उन्माद का कारण बन गए हैं।अफवाहें सबूतों की जगह ले लेती हैं।भीड़ अदालतों का स्थान ले लेती है और हिंसा न्याय की जगह ले लेती है।इसका परिणाम इस्लाम की रक्षा नहीं,बल्कि उसका विकृतिकरण है।इस्लाम को अपनी रक्षा के लिए भीड़ की आवश्यकता नहीं है।सत्य इतना कमजोर नहीं है कि उसे जीवित रहने के लिए भीड़ द्वारा की जाने वाली हत्याओं की आवश्यकता हो।कुरआन स्वीकार करता है कि विश्वासियों को उपहास,अपमान और उकसावे का सामना करना पड़ेगा,लेकिन इसकी प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक रूप से संयमित है,दूर चले जाओ।कुरआन कहीं भी आम विश्वासियों को हिंसा से वाणी का दंड देने का निर्देश नहीं देता।यह चूक आकस्मिक नहीं है।यह एक गहन नैतिक दृष्टि को दर्शाती है।दृढ़ विश्वास पर आधारित आस्था अपमान से भयभीत नहीं होती।यह गरिमा के साथ प्रतिक्रिया करती है। ऐसे मामलों में जवाबदेही ईश्वर की है,जब तक कि वाणी सीधे हिंसा या विद्रोह से जुड़ी न हो।यह व्याख्या आधुनिक तुष्टीकरण नहीं है,यह कुरआन की अपनी नैतिक संरचना में निहित है।पैगम्बर मुहम्मद स्वयं भी अपमान से अछूते नहीं रहे,वे अक्सर इसके शिकार होते थे।उन्हें झूठा,कवि,पागल कहकर उपहास किया गया।उनकी प्रतिक्रिया स्व-न्याय नहीं,बल्कि नैतिक संयम थी।ताइफ में अपमानित और लहूलुहान होने पर भी उन्होंने ईश्वरीय दंड स्वीकार करने से इनकार कर दिया।मक्का में अपमानित होने पर भी उन्होंने विजय प्राप्त करने के बाद क्षमा कर दिया।ये कमजोरी के नहीं,बल्कि नैतिक दृढ़ता के संकेत थे।पैगम्बर के आचरण को नकारते हुए उनके प्रति प्रेम का दावा करना विरोधाभास है।आप उनके चरित्र का उल्लंघन करके उनके सम्मान की रक्षा नहीं कर सकते।विद्वान इस बात से इनकार नहीं करते कि शास्त्रीय न्यायविदों ने ईशनिंदा पर बहस की थी।उन्होंने की थी,लेकिन हमेशा सख्त कानूनी ढाँचों के भीतर।यहाँ तक कि सबसे रूढ़िवादी न्यायविदों ने भी राज्य के अधिकार,उचित प्रक्रिया,सत्यापित साक्ष्य और पश्चाताप के अवसर पर जोर दिया।इब्न तैमियाह,जिनके उद्धरण अक्सर चुनिंदा रूप से दिए जाते हैं,ने भीड़ की कार्रवाई और अराजकता (फितना) को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया।इमाम अबू हनीफा ने मृत्युदंड को सीमित किया और संयम पर जोर दिया।शास्त्रीय कानून इसके निष्कर्ष चाहे जो भी हों,यह कभी भी भावनात्मक, तात्कालिक या जन-प्रेरित नहीं था।आज हम जो देख रहे हैं वह शरिया का क्रियान्वयन नहीं,बल्कि उसका पतन है।यथार्थवादी दृष्टिकोण ईशनिंदा के आरोपों के सामाजिक राजनीतिक दुरुपयोग को भी दर्शाता है।दक्षिण एशिया में ये आरोप अक्सर धार्मिक अल्पसंख्यकों,गरीबों और शक्तिहीनों,असंतुष्टों और सुधारकों को निशाना बनाते हैं।उन लोगों को जो सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं।यह चयनात्मक प्रयोग समस्या को उजागर करता है।ईशनिंदा श्रद्धा से अधिक नियंत्रण का विषय बन जाती है।इस्लाम व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने और वर्चस्व स्थापित करने का एक साधन बन जाता है।यह न्याय का घोर उल्लंघन है,जो कुरआन का एक मूल मूल्य है।शेख अब्दुल्ला बिन बय्या जैसे विद्वान हमें याद दिलाते हैं कि रक्तपात,अराजकता और भय की ओर ले जाने वाली कोई भी व्याख्या,भले ही धार्मिक भाषा में लिपटी हो,इन उद्देश्यों के विपरीत है।जब ईशनिंदा के आरोप भीड़ को भड़काते हैं,तो इस्लाम का नैतिक उद्देश्य विफल हो जाता है।मुस्लिम समाजों को रक्षात्मक आक्रोश से आगे बढ़कर नैतिक आत्मविश्वास की ओर बढ़ना चाहिए।इसके लिए धार्मिक नेताओं द्वारा भीड़ हिंसा का खुलेआम खंडन,अपराधियों के लिए कानूनी जवाबदेही, नैतिकता पर आधारित धार्मिक शिक्षा और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को धार्मिक कर्तव्य के रूप में मानना आवश्यक है,न कि किसी रियायत के रूप में।चुप्पी तटस्थता नहीं है,जब इस्लाम के नाम पर अन्याय होता है और मुसलमान चुप रहते हैं,तो आस्था को ही ठेस पहुँचती है।हमारे सामने स्पष्ट विकल्प है।हम या तो उस रास्ते पर चलते रह सकते हैं जहाँ आस्था को भय,रक्तपात और जबरदस्ती से जोड़ा जाता है या हम इस्लाम को न्याय,दया और संयम पर आधारित एक नैतिक शक्ति के रूप में पुनर्स्थापित कर सकते हैं।इस्लाम की रक्षा के लिए लोगों को मारना आवश्यक नहीं है,इसके लिए साहस की आवश्यकता है,नैतिक साहस की, यह कहने के लिए कि यह हिंसा गलत है,गैर-इस्लामी है और इसे रोकना होगा।




























