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आपका विषय बहुत गंभीर और सामयिक है। रुड़की में कुत्तों का बढ़ता आतंक न सिर्फ जन सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है, बल्कि यह प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। 


रुड़की में कुत्तों का बढ़ता आतंक: लाचार प्रशासन, भयभीत जनता

गली-गली में घूमते खतरनाक कुत्ते, पालतू प्रजातियां भी बना रही हैं खतरा

रुड़की शहर में आवारा और आक्रामक कुत्तों की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। स्थिति यह है कि अब लोग बच्चों को अकेले बाहर भेजने में डरते हैं, और सुबह की सैर करने वालों तक को सतर्क रहना पड़ता है। हर मोहल्ले में कुत्तों का झुंड दिखाई देना आम बात हो गई है।

प्रतिदिन सिविल अस्पताल में घायल नागरिकों की भीड़

सिविल अस्पताल में प्रतिदिन दर्जनों लोग कुत्ते के काटने की शिकायत लेकर पहुंचते हैं। डॉक्टरों के अनुसार, प्रतिदिन औसतन 30-40 लोग एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने आ रहे हैं। पीड़ितों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की संख्या सबसे अधिक है।

प्रशासन की लापरवाही बनी चिंता का विषय

शहर में कुत्तों की नसबंदी, टीकाकरण और पंजीकरण जैसे जरूरी कदम कहीं नज़र नहीं आ रहे हैं। न ही नगर निगम की ओर से आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए कोई ठोस कार्रवाई हो रही है। वहीं, कुछ लोग खतरनाक और प्रतिबंधित प्रजातियों के पालतू कुत्ते बिना पंजीकरण के रख रहे हैं, जिससे खतरा और भी बढ़ गया है।

नागरिकों की मांग – जल्द हो ठोस कार्रवाई

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही नगर निगम और प्रशासन की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। कई मोहल्लों में लोगों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर प्राइवेट डॉग कैचर्स बुलाने तक की योजना बनाई है।


क्या प्रशासन नींद से जागेगा, या हालात और बिगड़ेंगे?

रुड़की की जनता अब प्रशासन से ठोस जवाब और कार्रवाई की उम्मीद कर रही है। सवाल यह है कि क्या नगर निगम सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित रहेगा, या जमीन पर उतरकर असली बदलाव लाएगा?


सोशल मीडिया पर भी #डर का माहौल

इस गंभीर विषय पर खुलकर बात करने से अब लोग सोशल मीडिया पर भी बचने लगे हैं, क्योंकि तथाकथित “कुत्ता प्रेमी गैंग” विरोध करने वालों पर हमलावर हो जाती है। कई लोग जानवरों के प्रति संवेदना के नाम पर मानव सुरक्षा की अनदेखी कर रहे हैं, जिससे मामला और भी उलझ गया है।

प्रशासनिक उदासीनता और कागज़ी कार्रवाई

#नगर निगम की ओर से कुत्तों की नसबंदी (एंटी बर्थ कंट्रोल), पंजीकरण, और आक्रामक प्रजातियों की निगरानी को लेकर जो योजनाएं बनाईं गई थीं, वे अब तक कागजों से बाहर नहीं आ सकीं।

न पालतू कुत्तों का पंजीकरण हो रहा है, न ही नसबंदी का कोई ठोस अभियान दिख रहा है।

शहर में कई लोग रॉटविलर, पिटबुल, कोकेशियन शेफर्ड जैसी प्रतिबंधित नस्लों को खुलेआम गली-मोहल्लों में घुमा रहे हैं।

आम नागरिकों को यह भी पता नहीं होता कि कौन-सा कुत्ता पालतू है और कौन आवारा, कौन सुरक्षित है और कौन

खतरनाक।

समर्थ भारत न्यूज़

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