
रुड़की। डिजिटल पेमेंट के बढ़ते चलन के साथ ही अपराध का तरीका भी बदल गया है। अब लुटेरों को न चाकू की जरूरत है, न पिस्टल की, न किसी मकान पर कब्जा करने की और न ही राहगीरी करने की। साइबर ठग अब मोबाइल, इंटरनेट और लालच के सहारे आसानी से लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं।

यदि रोज़ाना अखबारों पर नजर डाली जाए तो शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो, जब साइबर ठगी से जुड़ी एक या एक से अधिक खबरें प्रकाशित न होती हों। बैंक खातों से पैसे उड़ जाना, फर्जी कॉल, ओटीपी मांगकर ठगी, नकली लिंक भेजकर अकाउंट खाली कर देना—ये सब अब आम घटनाएं बन चुकी हैं। स्थिति यह है कि साइबर अपराध का जाल इतना मजबूत हो चुका है कि पुलिस भी कई मामलों में बेबस नजर आती है।

जहां मोटरसाइकिल लूट या घर में चोरी होने पर पुलिस कैमरों और तकनीकी माध्यमों से अपराधियों तक पहुंचने की कोशिश कर लेती है, वहीं साइबर ठगों तक पहुंचना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। ठगी का शिकार व्यक्ति जब अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई गंवा देता है, तो उसके बाद साइबर सेल और थानों के चक्कर काटते-काटते थक जाता है, लेकिन कई बार उसे न्याय या राहत नहीं मिल पाती।

विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर ठगी के अधिकांश मामलों में कहीं न कहीं हमारी खुद की लापरवाही जिम्मेदार होती है। जरा सा लालच, एक अनजान कॉल पर भरोसा, एक फर्जी लिंक पर क्लिक करना या किसी को ओटीपी बता देना—बस यही एक छोटी सी गलती साइबर ठगों को मौका दे देती है। ठगों के पास अक्सर हमारी कई जानकारियां पहले से मौजूद होती हैं, उन्हें बस ओटीपी या हमारी असावधानी का इंतजार रहता है।
ऐसे में सबसे जरूरी है कि आम नागरिक खुद सतर्क रहें। किसी भी अनजान व्यक्ति को अपना ओटीपी, बैंक डिटेल, एटीएम पिन या पासवर्ड न दें। अनजान कॉल्स पर भरोसा न करें, किसी संदिग्ध लिंक को न खोलें और केवल आधिकारिक व प्रमाणिक वेबसाइटों का ही उपयोग करें। बैंक या किसी भी सरकारी संस्था के नाम से आए संदिग्ध संदेशों से सावधान रहें।
डिजिटल सुविधा के इस दौर में सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस या साइबर सेल की नहीं, बल्कि हर नागरिक की भी है। जागरूकता और सावधानी ही साइबर ठगी से बचाव का सबसे मजबूत हथियार है। एक छोटी सी सतर्कता आपकी जीवन भर की कमाई को सुरक्षित रख सकती है।



























