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आईआईटी रुड़की ने भारत में जनजातीय विकास पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया

भारत में जनजातियों की संख्या देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत

आईआईटी रुड़की ने भारत में जनजातीय विकास पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया

रुड़की। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग, आईआईटी रुड़की ने भारत में जनजातीय विकास: संभावना और पुनरावलोकन पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। संगोष्ठी को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित किया गया। यह सम्मेलन भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव का हिस्सा है। संगोष्ठी भारत में जनजातीय विकास से संबंधित मुद्दों और प्रश्नों को प्रतिबिंबित करती है। भारत में जनजातियों की संख्या देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत है। जनजातियों में लगभाग 705 समुदाय आते हैं जिन्होंने देश की विविधता में अत्यधिक योगदान दिया है, सभी के अद्वितीय और विशिष्ट रीति-रिवाज, भाषाएं, धर्म और जीवन के तरीके हैं।

आज़ादी के बाद के भारत में आदिवासी विकास एक गंभीर चिंता का विषय रहा है। उनकी स्थिति के उत्थान और सुधार के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम बनाये गए। आजादी के बाद से कई कार्यक्रम और नीतियां प्रस्तुत की गई हैं जो स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, खाद्य सुरक्षा, आजीविका और आय सृजन पर ध्यान केंद्रित करते हुए जनजातियों की जीवन स्थितियों के विकास और सुधार को लक्षित करती हैं। दो दिवसीय संगोष्ठी संवैधानिक अधिकारों और संरक्षण, शासन और प्रशासन और राज्य की भूमिका, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका, पहचान और जनजातियां, आदिवासी महिलायें और विकास, क्षेत्रीय विकास और जनजातियां, और जनजातियां और पर्यावरण जैसे विषयों पर ज़ोर देगी। 

इस कार्यक्रम में प्रो. के.के. पंत, निदेशक, आईआईटी रुड़की, उपस्थित रहे; प्रो. वर्जिनियस सक्सा ने कार्यक्रम को संबोधित किया, जो वर्तमान में मानव विकास संस्थान (आईएचडी), नई दिल्ली में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। आईएचडी में शामिल होने से पहले, वह तेजपुर विश्वविद्यालय (2016-2018) में प्रख्यात और भारत रत्न लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई चेयर के प्रोफेसर थे। वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी कैंपस (2011-2016) के प्रोफेसर और उप निदेशक भी थे। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, दिल्ली विश्वविद्यालय (1990-2011), और नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलांग (1978-1990) में समाजशास्त्र पढ़ाया है।

दो दिवसीय संगोष्ठी में प्रतिष्ठित कर्मियों ने भारत में आदिवासी समुदाय की स्थिति के बारे में बात की। इनमें डॉ. बिपाशा रोज़ी लकड़ा, प्रोफेसर वी. बीजूकुमार, डॉ. श्रेया जेसिका धान, डॉ. जाधव प्रताप सिंह, शिवांगी बरुआ, रामेंगमाविया बाविट्लुंग, मृणालिनी राज, डॉ. थंगगौलेन किपगेन, डॉ. प्रताप सी. मोहंती, डॉ. कुमारी विभूति नायक, मनस्मिता खिलार, मंटा वांगसू, सी ज़ोनुनमाविया, डॉ. दीपाली अपराजिता, थांगसियानडोंग गुइट और डॉ. देबदुलाल साहा, ख. पावी, नीलम केरकेट्टा, जसोधरा बोरठाकुर, पी. लालपेखलुई, डॉ. आशीष सक्सा सम्मिलित रहे।

मानव विकास संस्थान के विजिटिंग प्रोफेसर, प्रो वर्जिनियस सक्सा ने कहा, “राज्यों और क्षेत्रों के संदर्भ में, जनजातीय समुदायों की विविधता और भौगोलिक विस्तार के चलते, जनजातीय विकास के स्तरों में महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा के क्षेत्र में की गई प्रगति अपर्याप्त है। मिजोरम और नागालैंड जैसे अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों ने साक्षरता के क्षेत्र में क्रमशः 91.51 प्रतिशत और 80.04 प्रतिशत (2011 की जनगणना) के प्रभावशाली रिकॉर्ड हासिल किए हैं।”

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के के पंत ने कहा, “भारत में जनजातियां देश की कुल आबादी का लगभग 8.6 प्रतिशत हैं। जनजातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक हितों और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष रूप से संबंधित मुद्दों पर कई विशेष संवैधानिक प्रावधान बनाए जा रहे हैं, इनमे सकारात्मक कार्रवाई, प्रशासन के मुद्दे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, और संसाधनों तक पहुंच, इत्यादि प्रमुख हैं ।”

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